75 वर्षों से जीवित है बल्दीराय की रामलीला की गौरवशाली परंपरा, युवा किरदारों ने संभाल रखी है विरासत
- by Manjesh Kumar
- 14-Oct-2026
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सुल्तानपुर (उप्र): बल्दीराय कस्बे की रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि करीब साढ़े सात दशक से चली आ रही ऐसी सांस्कृतिक विरासत है, जिसे कस्बे के युवाओं ने आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ संजोकर रखा है। बदलते दौर, आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव और समय के साथ बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद बल्दीराय की रामलीला की परंपरा आज भी उसी जीवंतता के साथ आगे बढ़ रही है। वर्ष 1952 में बल्दीराय कस्बे के समाजसेवी ठाकुर दंगल सिंह ने नाटक की नींव रखी थी। उस समय शुरू हुई यह धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा धीरे-धीरे कस्बे की पहचान बन गई। दंगल सिंह के निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक रामलीला की यह परंपरा विलुप्त हो गई और मंचन का सिलसिला थम गया।
विलुप्त परंपरा को सिद्धनाथ सिंह ने नया जीवन दिया
वर्ष 1967 में कस्बे के प्रमुख समाजसेवी स्वर्गीय सिद्धनाथ सिंह ने रामलीला की विलुप्त होती परंपरा को दोबारा जीवित करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने नव युवक रामलीला समिति का गठन कर कस्बे के युवाओं को इससे जोड़ा। इसके बाद रामलीला का मंचन फिर शुरू हुआ और देखते ही देखते युवाओं की भागीदारी ने इसे नई ऊर्जा प्रदान कर दी। सिद्धनाथ सिंह की इसी पहल का परिणाम है कि आज भी बल्दीराय के युवा उनकी इस प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। पीढ़ियां बदलती गईं, लेकिन रामलीला के प्रति लोगों की आस्था और युवाओं का उत्साह लगातार कायम है।
वर्ष 1952 में ठाकुर दंगल सिंह ने शुरू कराया था नाटक
बल्दीराय कस्बे में रामलीला की शुरुआत वर्ष 1952 में समाजसेवी ठाकुर दंगल सिंह ने कराई थी। धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुए नाटक ने देखते ही देखते कस्बे में अपनी अलग पहचान बना ली।
दंगल सिंह के निधन के बाद थम गई थी परंपरा
नाटक के संस्थापक ठाकुर दंगल सिंह के निधन के बाद करीब डेढ़ दशक तक बल्दीराय में नाटक का मंचन नहीं हो सका। एक समय ऐसा आया जब यह प्राचीन परंपरा पूरी तरह विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई थी।
सिद्धनाथ सिंह ने युवाओं को जोड़कर रचा नया इतिहास
वर्ष 1967 में समाजसेवी स्वर्गीय सिद्धनाथ सिंह ने नाटक को पुनर्जीवित किया। उन्होंने पुरानी परम्परा को जीवन्त रखते हुए नव युवक रामलीला समिति का गठन किया और कस्बे के युवाओं को रामलीला से जोड़कर बंद हो चुकी परंपरा को दोबारा जीवंत कर दिया।
नई पीढ़ी निभा रही पुराने किरदारों की परंपरा
बल्दीराय रामलीला की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आज भी इसके मंचन में स्थानीय युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। युवा कलाकार विभिन्न किरदार निभाकर न केवल भगवान श्रीराम की कथा को मंच पर जीवंत करते हैं, बल्कि पूर्वजों द्वारा शुरू की गई सांस्कृतिक परंपरा को भी आगे बढ़ा रहे हैं।
रूपेश द्विवेदी, प्रवीण तिवारी और रंजीत सिंह का रहा अथक प्रयास
रामलीला की परंपरा को संस्थागत पहचान दिलाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास हुए। वर्ष 2025-26 में क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार रूपेश द्विवेदी, प्रवीण तिवारी एवं रंजीत सिंह के अथक प्रयासों से नव युवक रामलीला समिति का पंजीकरण कराया गया। पंजीकरण के बाद समिति को रामलीला के आयोजन और परंपरा को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने में नई मजबूती मिली है।
25 अक्टूबर को रामलीला का होगा समापन
समिति के महामंत्री कन्हैया लाल अग्रहरि ने बताया कि इस वर्ष बल्दीराय की रामलीला का शुभारंभ 18 अक्टूबर से होगा, जबकि 25 अक्टूबर को समापन किया जाएगा। आयोजन को लेकर समिति के पदाधिकारी और युवा कलाकार तैयारियों में जुटे हैं।


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