एल नीनो के दौर में चारा प्रबंधन: तैयारी, संरक्षण और टिकाऊ समाधान
- by Manjesh Kumar
- 27-Aug-2026
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पटना: बदलती जलवायु और बढ़ती मौसमी अनिश्चितताओं के बीच पशुधन के लिए वर्षभर पर्याप्त एवं पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एल नीनो जैसी जलवायु घटनाएँ इस चुनौती को और बढ़ा सकती हैं। इनके प्रभाव से वर्षा की कमी, तापमान बढ़ने तथा सूखे और लंबे समय तक शुष्क परिस्थितियों की संभावना बढ़ जाती है। इसका सीधा असर हरे चारे की उपलब्धता, चारागाहों की वृद्धि और चारा फसलों की उत्पादकता पर पड़ता है। भारत में यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पशुधन का पोषण मुख्यतः मौसमी हरे चारे, फसल अवशेषों और चरागाह संसाधनों पर निर्भर करता है। देश में चारे की उपलब्धता में पहले से ही अंतर बना हुआ है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान के आकलनों के अनुसार देश में लगभग 11% हरे चारे और 23% सूखे चारे की कमी है। सूखे और लंबे समय तक शुष्क मौसम में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है, क्योंकि चारा उत्पादन और चारागाहों की उत्पादकता घटने से संरक्षित चारे तथा फसल अवशेषों पर निर्भरता बढ़ जाती है। ऐसे में चारा सुरक्षा का आकलन केवल उपलब्ध मात्रा से नहीं, बल्कि उसकी समय पर उपलब्धता, पोषण गुणवत्ता और किसानों तक पहुँच के आधार पर किया जाना आवश्यक है। एल नीनो के दौरान नमी एवं ताप तनाव, कम जैवभार उत्पादन और चरागाह संसाधनों में गिरावट इस अंतर को और बढ़ा सकते हैं। इसलिए पशुधन की उत्पादकता बनाए रखने और कृषि प्रणालियों को अधिक जलवायु-लचीला बनाने के लिए अग्रिम योजना, अतिरिक्त चारे का संरक्षण, फसल अवशेषों का दक्ष उपयोग, जलवायु-सहिष्णु चारा उत्पादन और संतुलित आहार पर आधारित समग्र चारा प्रबंधन को अपनाना आवश्यक है।
एल नीनो के दौरान प्रमुख चारा प्रबंधन रणनीतियाँ
- अतिरिक्त चारे का संरक्षण: अनुकूल मौसम में उपलब्ध अतिरिक्त हरे चारे को साइलेज और हे (सूखा चारा) के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। मक्का, ज्वार और उपयुक्त चारा घासें साइलेज के लिए उपयोगी हैं, जबकि घास और दलहनी चारे को सुखाकर हे के रूप में संरक्षित किया जा सकता है। उचित अवस्था पर कटाई, सही ढंग से सुखाने और सुरक्षित भंडारण से चारे की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिलती है। संरक्षित चारे का पर्याप्त भंडार, शुष्क अवधि में चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने, चरागाहों पर दबाव को कम करने और महंगे चारे पर निर्भरता घटाने में सहायक होता है।
- फसल अवशेषों का दक्ष उपयोग: धान और गेहूं का भूसा, मक्का के अवशेष तथा दलहनी फसलों के अवशेष चारे की कमी के दौरान महत्वपूर्ण पशु आहार संसाधन बन सकते हैं। इन्हें जलाने या नष्ट करने के बजाय एकत्र कर उचित ढंग से भंडारित और उपयोग किया जाना चाहिए। कुट्टी करने से चारे की बर्बादी कम होती है और पशुओं द्वारा चारे के सेवन में सुधार होता है। वहीं, उपयुक्त यूरिया उपचार और पोषक पूरकता से निम्न गुणवत्ता वाले भूसे की पाचनशीलता और पोषण मूल्य बढ़ाया जा सकता है। फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग फसल-पशुधन एकीकरण तथा पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण को भी बढ़ावा देता है।
- जलवायु-सहिष्णु चारा उत्पादन: सूखा एवं ताप-सहिष्णु तथा कम पानी की आवश्यकता वाली चारा फसलों और किस्मों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। चारा फसलों में विविधता लाने से उत्पादन पूरी तरह विफल होने का जोखिम कम होता है। मक्का + लोबिया जैसे अनाज-दलहन मिश्रण अधिक जैवभार के साथ बेहतर पोषण गुणवत्ता प्रदान कर सकते हैं। कम अवधि वाली चारा फसलों को उपलब्ध फसल अवधि में शामिल किया जा सकता है। इसके अलावा, खेत की मेड़ों, सीमाओं, घर के आसपास और अन्य उपयुक्त स्थानों पर भी चारा उगाया जा सकता है। समय पर बुवाई, नमी संरक्षण, पलवार (मल्चिंग) और दक्ष सिंचाई से एल नीनो जैसी परिस्थितियों में चारा उत्पादन बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
- चारा वृक्ष एवं वैकल्पिक चारा संसाधन: सुबबूल, ग्लिरिसिडिया, सेसबेनिया, अकेशिया और सहजन जैसे चारा वृक्ष एवं झाड़ियाँ विशेष रूप से शुष्क और चारा-संकट की अवधि में हरे जैवभार तथा प्रोटीन के विश्वसनीय स्रोत प्रदान कर सकते हैं, जब मौसमी चारा फसलें और चारागाह कम उत्पादक हो जाते हैं। इन बहुवर्षीय प्रजातियों को खेत की मेड़ों, सीमाओं, घर के आसपास तथा सिल्वोपाश्चरल प्रणालियों में लगाया जा सकता है, जिससे खाद्य फसलों के क्षेत्र को प्रभावित किए बिना अतिरिक्त चारा प्राप्त किया जा सके। इन वृक्षों की गहरी जड़ें मिट्टी की निचली परतों से नमी का उपयोग करने में सक्षम होती हैं, जिससे सूखे और अल नीनो जैसी परिस्थितियों में भी चारे की उपलब्धता लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिलती है, जबकि उथली जड़ वाली मौसमी चारा फसलें अधिक नमी तनाव का सामना नहीं कर पातीं। चारा वृक्षों को घास और दलहनी चारा फसलों के साथ रणनीतिक रूप से एकीकृत करने से पूरे वर्ष अधिक निरंतर और विविध चारा संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं तथा मौसमी चारा उत्पादन पर निर्भरता कम की जा सकती है। इस प्रकार, चारा आधारित कृषि-वनीकरण प्रणालियाँ पशुधन के लिए अतिरिक्त चारा उपलब्ध कराने के साथ-साथ कृषि प्रणाली की समग्र जलवायु-लचीलापन क्षमता को भी बढ़ा सकती हैं।
- चारा बैंक एवं अग्रिम तैयारी: ग्राम और सामुदायिक स्तर पर चारा बैंक एल नीनो से उत्पन्न चारा संकट के विरुद्ध प्रभावी सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। पर्याप्त मात्रा में हे, भूसा और साइलेज को चारे की अधिकता वाले समय में एकत्र कर सुरक्षित रखा जा सकता है और आवश्यकता के समय उपयोग किया जा सकता है। किसानों को पशुधन की चारा आवश्यकता का पूर्व आकलन कर न्यूनतम चारा भंडार बनाए रखना चाहिए, वैकल्पिक चारा संसाधनों की पहचान करनी चाहिए तथा मौसम पूर्वानुमानों का उपयोग करना चाहिए।
निष्कर्ष: दीर्घकालिक दृष्टिकोण में “तत्काल चारा राहत” से “सक्रिय चारा सुरक्षा” की ओर बढ़ना आवश्यक है। सूखा-सहिष्णु चारा फसलों, अनाज-दलहन मिश्रण, चारा वृक्षों, फसल अवशेषों के संवर्धन, साइलेज एवं हे संरक्षण, संतुलित आहार, दक्ष जल उपयोग और सामुदायिक चारा बैंकों पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए। चारे की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता और पोषण संतुलन पर भी समान ध्यान आवश्यक है। अल नीनो चारा संकट को बढ़ा सकता है, लेकिन समय पर तैयारी और स्थानीय संसाधनों के दक्ष उपयोग से इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उत्पादन, संरक्षण, विविधीकरण, दक्ष उपयोग, पुनर्चक्रण और अग्रिम योजना को एकीकृत करने वाली जलवायु-स्मार्ट चारा प्रबंधन प्रणाली ही टिकाऊ और जलवायु-लचीली पशुधन आधारित कृषि प्रणालियों की आधारशिला बन सकती है।
अभिषेक कुमार और नीति लखानी की कलम से


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