धान की खेती के प्रबंधन विषय पर एकदिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसानों को दी गई खेती से संबंधित कई अहम जानकारी

मधेपुरा: मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड अंतर्गत मधुकरचक पंचायत में कृषि विभाग बिहार सरकार कृषि प्रौद्योगिकी एवं प्रबंध अभिकरण, मधेपुरा के तत्वावधान में त्रि-फसली प्रणाली योजना के प्रथम चरण के तहत एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन प्रभारी पदाधिकारी एवं वरीय मृदा वैज्ञानिक, सिंचाई अनुसंधान केंद्र मधेपुरा डॉ पंकज कुमार यादव, पशुपालन वैज्ञानिक डॉ सुनील कुमार कृषि विज्ञान केंद्र मधेपुरा एवं प्रखंड कृषि कार्यालय, बिहारीगंज के पदाधिकारियों ने संयुक्त रूप से किया।

कार्यक्रम में मधुकर चक पंचायत क्षेत्र के बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। प्रशिक्षण के दौरान डॉ पंकज कुमार यादव प्रभारी पदाधिकारी एवं वरीय मृदा वैज्ञानिक सिंचाई अनुसंधान केंद्र मधेपुरा द्वारा उपस्थित किसानों को धान की वैज्ञानिक खेती, फसल प्रबंधन, उन्नत कृषि तकनीक, संतुलित उर्वरक प्रयोग तथा फसल उत्पादन को बेहतर बनाने से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी दी गई। किसानों को खेत के गर्मी की जुताई, ढैंचा की हरी खाद, केचुआ खाद, गोबर की खाद, मृदा नमूना लेने की आवश्यकता, मिट्टी जांच के उपरांत संतुलित पोषक तत्वों के प्रबंधन के साथ साथ समेकित पोषक तत्व प्रबंधन पर विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने धान की फसल में खरपतवार प्रबंधन, कीट प्रबंधन, रोग एवं उनके प्रबंधन पर चर्चा की। डॉ यादव ने किसानों से अपील की कि आप लोग मिट्टी में कार्बन की मात्रा को बढ़ाएं, तभी आने वाली पीढ़ी के लिए मिट्टी स्वस्थ रह सकती है।

मिट्टी में कार्बन के महत्व पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि एक ग्राम मिट्टी में एक अरब बैक्टीरिया पाया जाता है। वही बैक्टीरिया हम जो भी खाद उर्वरक मिट्टी में डालते हैं उसके रूप की परिवर्तित करने का कार्य करता है, तब जाकर पोषक तत्व पौधे को उपलब्ध हो पाता है। यदि कार्बन की मात्रा का स्तर मिट्टी में कम है तो पोषक तत्वों की उपलब्धता भी कम होगी और फसल का उत्पादन प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि किसान यदि डीएपी उर्वरक नहीं है तो आप लोग डीएपी के स्थान पर सिंगल सुपर फास्फेट का उपयोग करें। इसके द्वारा पौधे को फास्फोरस के साथ साथ सल्फर एवं कैल्सियम की भी आपूर्ति हो जाती है। धान की फसल में यदि किसान भाई रोपाई के समय जिंक सूक्ष्म पोषक तत्व का प्रयोग नहीं किए हैं तो जिंक की कमी का लक्षण रोपाई के 28-30 दिन बाद दिखाई पड़ता है जिसे किसान भाई ललकी रोग कहते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे खैरा रोग कहते हैं, इसके उपचार के लिए जिंक सल्फेट का तीन ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें। पंद्रह दिन बाद पुनः एक छिड़काव करें तो जिंक की कमी को सुधार सकते हैं।

डॉ सुनील कुमार पशुपालन वैज्ञानिक कृषि विज्ञान केंद्र, मधेपुरा  ने उपस्थित किसानों को तकनीकी जानकारी प्रदान की। प्रश्न उत्तर के दौरान किसानों के द्वारा बकरी पालन, गाय पालन, मुर्गी पालन से संबंधित प्रश्न पूछे गए जिनका उत्तर डॉ सुनील कुमार के द्वारा दिया गया। प्रखंड कृषि कार्यालय के पदाधिकारियों द्वारा कृषि विभाग के द्वारा किसानों के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं एवं आधुनिक कृषि पद्धतियों की जानकारी भी दी गई। कृषि विभाग के प्रशिक्षकों ने किसानों से समय पर कृषि कार्य करने, गुणवत्तापूर्ण कृषि इनपुट का प्रयोग करने तथा वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर उत्पादन एवं आय बढ़ाने की अपील की। किसानों ने भी खेती से जुड़ी अपनी समस्याओं एवं जिज्ञासाओं को विशेषज्ञों के समक्ष रखा, जिनका समाधान बताया गया। बिहार कृषि विभाग किसानों को प्रशिक्षण एवं विस्तार सेवाओं के माध्यम से आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी उपलब्ध करा रहा है। विभाग के आधिकारिक पोर्टल पर भी किसानों के लिए विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं कृषि योजनाओं की जानकारी उपलब्ध है। इस अवसर पर सभी की सक्रिय सहभागिता रही।

  

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