...तो चली जाएगी दीपक प्रकाश की मंत्री की कुर्सी? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और ECI से मांगा जवाब

पटना: पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश के किसी सदन का सदस्य बने बगैर बिहार सरकार में मंत्री होने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले को लेकर डॉक्टर एक याचिका पर सोमवार को सुनवाई हुई जिसके बाद कोर्ट ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह की याचिका पर सोमवार को जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी मोहना की बेंच में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान पीठ ने बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

बता दें कि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश बिना किसी सदन में सदस्य बने ही पहले नीतीश कैबिनेट में मंत्री बने फिर सम्राट चौधरी की कैबिनेट में भी मंत्री बनाए गए हैं। माना जा रहा था कि विधान परिषद चुनाव में उन्हें एमएलसी बनाया जायेगा लेकिन भाजपा ने रालोमो को एक भी सीट नहीं दी। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 164(4) के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। संविधान के इस अनुच्छेद के अनुसार अगर कोई व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य नहीं है, तो वह ज्यादा से ज्यादा सिर्फ 6 महीने तक ही मंत्री पद पर रह सकता है। इस 6 महीने के दौरान उसे किसी न किसी सदन का सदस्य चुनकर आना जरूरी होता है।

याचिकाकर्ता के वकीलों, सुदीप चंद्रा और सान्या कौशल ने अदालत में दलील दी कि दीपक प्रकाश को सबसे पहले 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी कैबिनेट में मंत्री बनाया था। इसके बाद 15 अप्रैल 2026 को नीतीश कुमार की सरकार गिर गई। फिर 7 मई 2026 को जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनी, तो दीपक प्रकाश को दोबारा मंत्री पद की शपथ दिला दी गई। वकीलों का कहना है कि पहली बार मंत्री बनने के हिसाब से उनके 6 महीने की मियाद 20 मई को ही पूरी हो चुकी है।

याचिका में कहा गया है कि किसी भी बिना चुने हुए व्यक्ति को बार-बार मंत्री बनाना सीधे तौर पर संवैधानिक ताकतों का गलत इस्तेमाल है। यह बिना चुनाव जीते 6 महीने तक मंत्री बने रहने की छूट का नाजायज फायदा उठाने जैसा है। कोर्ट के सामने साल 2001 के मशहूर ‘एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य’ मामले का उदाहरण रखा गया। इस ऐतिहासिक फैसले में साफ कहा गया था कि इस्तीफे, कैबिनेट में बदलाव या मुख्यमंत्री बदलने के बहाने 6 महीने की इस संवैधानिक समय-सीमा को दोबारा रीसेट नहीं किया जा सकता।

  

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