विकास के सारे दावे हवा हवाई, कटिहार में यहां जिंदा तो छोड़िए मरने के बाद भी इंसान को मिल रहा कष्ट

कटिहार: एक तरफ बिहार और देश के सियासी गलियारों में सत्ता पक्ष लगातार विकास करने का दावा करता है तो दूसरी तरफ राज्य के कई जगहों पर यह दावा दम तोड़ता हुआ दिखाई देता है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है कटिहार से जहां विकास तो दूर की बात है, इसका नामोनिशान तक नहीं दिखता है। आलम यह है कि जिंदा आदमी तो नदी नाला या हर तरह का बाधाएं किसी न किसी तरह पार कर ही लेते हैं लेकिन इलाके के मृत लोगों की अंतिम यात्रा भी कम कष्टदायक नहीं है।

मामला है कटिहार के फलका प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत मोरसंडा गांव न जहां से इंसानियत को झकझोड़ने वाली एक तस्वीर सामने आ रही है। इस तस्वीर ने न सिर्फ विकास के दावों को हवा हवाई बना दिया बल्कि इंसानियत को भी झकझोड़ कर रख दिया है। दरअसल यहां एक ग्रामीण की मौत के बाद परिजन और ग्रामीण अंतिम संस्कार के लिए अर्थी को घुटने भर पानी, कीचड़ और दलदल के बीच से कंधे पर उठाकर ले जगह। यह दृश्य देख हर किसी का कलेजा कांप उठा और इलाके की बदहाल बुनियादी व्यवस्था एक बार फिर उजागर हो गई।

जानकारी के अनुसार मोरसंडा निवासी करीब 50 वर्षीय अरविंद महलदार का निधन हो गया था। श्मशान घाट तक जाने के लिए कोई समुचित सड़क या पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों ने जान जोखिम में डालकर कमलाघाट नदी के पानी और दलदली रास्ते से होकर शव यात्रा निकाली। अंतिम यात्रा का यह मार्मिक दृश्य इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से कमलाघाट पर पुल निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक समस्या जस की तस बनी हुई है। बरसात के मौसम में हालात और भी भयावह हो जाते हैं, जिससे ग्रामीणों को रोजमर्रा के कार्यों के साथ बीमार और बुजुर्गों को अस्पताल पहुंचाने तक में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

मामले को लेकर प्रखंड प्रमुख दीपशिखा सिंह, जिला परिषद प्रतिनिधि मनोज मंडल, उप प्रमुख नेहा प्रवीण, मुखिया राजू नायक और युवा समाजसेवी सागर मिश्रा ने नाराजगी जताई। जनप्रतिनिधियों ने कहा कि देश को आजादी मिले दशकों बीत गए, लेकिन मोरसंडा के लोगों को आज तक कमलाघाट पर एक अदद पुल नसीब नहीं हुआ। सांसद और विधायक सिर्फ आश्वासन देते रहे, लेकिन धरातल पर काम नहीं दिखा। ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से अविलंब पुल निर्माण की मांग करते हुए कहा कि आखिर कब तक लोग ऐसी नारकीय स्थिति झेलने को मजबूर रहेंगे।

  

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