दाल-भात का स्वाद और शहनाई की गूंज: जब आंगन में ठहरे थे बिस्मिल्लाह खां

बक्सर: शहनाई को विश्व पटल पर अमर करने वाले भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां सिर्फ एक महान संगीत साधक ही नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े एक बेहद सरल और आत्मीय इंसान थे। डुमरांव के ठठेरी बाजार में जन्मे उस्ताद की स्मृतियां आज भी उनके पड़ोस और परिजनों के जेहन में जीवंत हैं। उनके जन्मस्थान से महज दस मीटर की दूरी पर रहने वाले उन पर शोध करने वाले लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव के परिवार के साथ उस्ताद का रिश्ता बेहद आत्मीय और ऐतिहासिक रहा।

15 दिन डॉ शशि भूषण श्रीवास्तव के घर में रहे थे उस्ताद

साल 1979 में भोजपुरी फिल्म ‘बाजे शहनाई हमार अंगना’ की शूटिंग के दौरान उस्ताद करीब 15 दिनों तक लेखक के घर पर ठहरे थे। विश्वविख्यात कलाकार होने के बावजूद उन्हें घर की रसोई का सादा भोजन दाल, भात, दनौरी और धनिया की चटनी बेहद पसंद थी। मां लेखक की मां माया श्रीवास्तव के हाथों का बना यह देसी खाना खाकर वे घर के बड़े-बुजुर्ग की तरह घुले-मिले रहते थे।

पिता की प्रेरणा और बहन की साधना से बनी किताब

पिता की प्रेरणा और उस्ताद के प्रति गहरे लगाव के चलते लेखक ने उनके जीवन को शब्दों में पिरोने का संकल्प लिया। डुमरांव में उस्ताद पर "शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां" पुस्तक लेखन के दौरान बहन ज्योति बाला अंधेरे में लैंप जलाकर और चाय देकर इस साहित्यिक साधना की मजबूत स्तंभ बनीं, वहीं मित्र प्रधानाचार्य दीपक कुमार 'बब्लू' ने पुस्तक प्रकाशन में अहम भूमिका निभाई। सन् 2008 में प्रभात प्रकाशन से ‘शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां’ पुस्तक प्रकाशित हुई।


15 नवंबर 2009 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, हरिवंश जी, प्रकाश झा और अली अनवर ने संयुक्त रूप से इस पुस्तक का विमोचन किया। इसी मंच से लेखक मुरली मनोहर श्रीवास्तव की मांग पर मुख्यमंत्री ने डुमरांव में राजकीय समारोह और संगीत संस्थान की घोषणा की थी, जो स्थापित हो रहा है। लेखक ने बाद में ‘बिस्मिल्लाह और शहनाई’ डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया और उत्तर प्रदेश सरकार से संवाद कर वाराणसी में उस्ताद की मजार के 20 लाख रुपये की लागत से जीर्णोद्धार में भी सक्रिय भूमिका निभाई। आज भी डुमरांव रेलवे स्टेशन पर गूंजती शहनाई की धुन और ठठेरी बाजार की गलियां इस बात की गवाह हैं कि बिस्मिल्लाह खां अपनी मिट्टी से कभी जुदा नहीं हुए।

  

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